
समालोचना चतस्रः - Samalochna Chatras (Balchanma (Nagarjun), Tamas (Bhishma Sahni), Zindaginama (Krishna Sobti), evam Anitya (Mridula Garg)
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समालोचना, आलोचना, विवेचना, विशà¥à¤²à¥‡à¤·à¤£ या समीकà¥à¤·à¤¾ का इतिहास बहà¥à¤¤ पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¤¾ है। जब से मानव-जाति अपनी बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿-वैà¤à¤µ à¤à¤µà¤‚ विवेक के बल पर फूल à¤à¤µà¤‚ काà¤à¤Ÿà¥‹à¤‚ का à¤à¥‡à¤¦ समà¤à¤¨à¥‡ लगी तथा उनके गà¥à¤£-दोषों की विवेचना à¤à¤µà¤‚ तà¥à¤²à¤¨à¤¾ करने लगी, तà¤à¥€ से इनका जनà¥à¤® मानना चाहिà¤à¥¤ मानव का नीर-कà¥à¤·à¥€à¤° परखने का यही विवेक उसे पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤¿à¤¤ किया होगा साहितà¥à¤¯à¤¿à¤• कृतियों की समालोचना, आलोचना, विवेचना या विशà¥à¤²à¥‡à¤·à¤£ की ओर अगà¥à¤°à¤¸à¤° होने के लिà¤à¥¤
इस आलोचनातà¥à¤®à¤• पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤• के लिठचार उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸à¥‹à¤‚ का चयन किया है जिनका पà¥à¤°à¤•ाशन सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾-पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ के बाद हà¥à¤† है। इन सà¤à¥€ में गà¥à¤²à¤¾à¤®à¥€ à¤à¤µà¤‚ उससे उपजी परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ का ही दरà¥à¤¦ है। पहला उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ नागारà¥à¤œà¥à¤¨ का "बलचनमा" है। जिसमें नागारà¥à¤œà¥à¤¨ ने परतंतà¥à¤° à¤à¤¾à¤°à¤¤ के मिथिलांचल के रारीबों की तà¥à¤°à¤¾à¤¸à¤¦à¥€ की कहानी कही है। दूसरा उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ à¤à¥€à¤·à¥à¤® साहनी का 'तमस' है। जिसमें विà¤à¤¾à¤œà¤¨ à¤à¤µà¤‚ देश की आज़ादी के ठीक पहले की कहानी है। à¤à¥€à¤·à¥à¤® साहनी ने 'तमस' के माधà¥à¤¯à¤® से उन संकीरà¥à¤£ मानसिकता के लोगों पर पà¥à¤°à¤¹à¤¾à¤° किया है, जिन लोगों ने सूअर और गाय को बचा लेने का पà¥à¤£à¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने की उमà¥à¤®à¥€à¤¦ में हज़ारों मासूमों के खून की होली खेली थी।
तीसरा उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ कृषà¥à¤£à¤¾ सोबती का "ज़िनà¥à¤¦à¤—ीनामा" है, जिसमें लेखिका ने अपनी जड़ से कटने की पीड़ा को तो इस उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ में पà¥à¤°à¤•ट किया ही है, साथ ही अंगरेजों के अतà¥à¤¯à¤¾à¤šà¤¾à¤° और सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ सेनानियों के तà¥à¤¯à¤¾à¤— की कहानी à¤à¥€ कही है। चौथा उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ है मृदà¥à¤²à¤¾ गरà¥à¤— का "अनितà¥à¤¯" जो गाà¤à¤§à¥€ जी के असहयोग आनà¥à¤¦à¥‹à¤²à¤¨ और à¤à¤—त सिंह के कà¥à¤°à¤¾à¤‚तिकारी आनà¥à¤¦à¥‹à¤²à¤¨ को केनà¥à¤¦à¥à¤° में रखकर लिखा गया है। समालोचना के दौरान à¤à¤°à¤¸à¤• यह पà¥à¤°à¤¯à¤¤à¥à¤¨ किया गया है कि इन चारों गà¥à¤°à¤‚थों को खà¥à¤²à¤•र बोलने का मौक़ा मिले।
"जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¥à¤¸à¥à¤°à¤¾ जी की आलोचना हर आलोचà¥à¤¯ उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ की विशेषताओं को अपने विशà¥à¤²à¥‡à¤·à¤£ में अलग करती हैं और किस तरह वे सà¤à¥€ उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ à¤à¤• वृहतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¸à¤‚ग में समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§à¤¿à¤¤ हैं इसका संकेत करती हैं .... सà¥à¤µà¤¾à¤§à¥€à¤¨à¤¤à¤¾ का संघरà¥à¤· जहाठà¤à¥€ है. जैसा à¤à¥€ है- इन सà¤à¥€ में फैले आकाश में पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤¶ करने की योगà¥à¤¯à¤¤à¤¾ उनकी आलोचना में निहित है।"
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